संदेश

जुगनू

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वह एक छोटा सा पल था जब वह उसे रोशनी के मुहाने पर छोड़ आया था और खुद अंधेरे की तरफ चल पड़ा था. जब वह उससे पहली बार उस भयानक अंधेरे में मिला था तो उसने कहा था - तुम जुगनू की तरह लगते हो, एक रोशनी सी निकलती है तुमसे. वह मुस्कुरा दिया था, शायद इसलिये कि यदि वहाँ रोशनी होती तो वह उसे एक मामूली सा कीड़ा समझती. अंधेरा खूबसूरत दृश्य को भी भयानक बना देता है.. उसने वहाँ की खूबसूरती देखी थी सो उसे बस रोशनी के वहाँ तक पहुँच आने का इन्तज़ार था.. और वह रोशनी तक पहुँच जाना चाहती थी. यह लघुकथा 2008 में लिखी गयी थी. उस दौर में दिमाग़ ज़्यादा विकसित नहीं हुआ था सो भावनाओं के सहारे अपने आस पास को समझने का सिलसिला चल रहा था।  लगभग दो दशक बाद उसी तरह के किरदारों को देखकर लगता है कि जीवन जीने का सलीका तब समझ आता है जब जीवन हाथ से निकल चुका होता है। आज भी कई बच्चे बस कहीं न कहीं पहुँच जाना चाहते हैं, बिना वर्तमान को महसूस किए।

सूजन

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रात के सन्नाटे उकेर देते हैं, उसकी छवि परिवार के झगड़ों से सहमी किवाड़ की ओट से निहारती दो प्यारी सी आँखें उन झगड़ों के साथ उसके आँसू भी रूकते हैं और तब तक वे आँखें सूज चुकी होती हैं। ग्रामीण परिवेश में अक्सर घरेलू झगड़ों के साथ-साथ खेतों को लेकर मारपीट आम हुआ करती थी, पहले सिर फोड़ देने और पैर तोड़ देने तक ही क्रोध सीमित था. अब तो बिना प्राण लिए किसी का गुस्सा शान्त नहीं होता. उस दौर में जो घर के संवेदनशील बच्चे होते थे, जिन्होंने ऐसी दुनिया की कभी कल्पना न की थी, उनके सामने उनके अपनों को इस तरह मारा-पीटा जाना उन्हें बेहद तकलीफ़ देता था. सुबह से लेकर शाम तक उन झगड़ों को देखकर, महसूस कर के वे बस रोते रहते थे. बचपन में इस तरह की मासूम संवेदनाओं को ऐसे मार डालना एक तरह से मनुष्यता को ख़त्म करने जैसा है।