सूजन
रात के सन्नाटे
उकेर देते हैं, उसकी छवि
परिवार के झगड़ों से सहमी
किवाड़ की ओट से निहारती
दो प्यारी सी आँखें

उन झगड़ों के साथ
उसके आँसू भी रूकते हैं
और तब तक वे आँखें
सूज चुकी होती हैं।
ग्रामीण परिवेश में अक्सर घरेलू झगड़ों के साथ-साथ खेतों को लेकर मारपीट आम हुआ करती थी, पहले सिर फोड़ देने और पैर तोड़ देने तक ही क्रोध सीमित था. अब तो बिना प्राण लिए किसी का गुस्सा शान्त नहीं होता. उस दौर में जो घर के संवेदनशील बच्चे होते थे, जिन्होंने ऐसी दुनिया की कभी कल्पना न की थी, उनके सामने उनके अपनों को इस तरह मारा-पीटा जाना उन्हें बेहद तकलीफ़ देता था. सुबह से लेकर शाम तक उन झगड़ों को देखकर, महसूस कर के वे बस रोते रहते थे. बचपन में इस तरह की मासूम संवेदनाओं को ऐसे मार डालना एक तरह से मनुष्यता को ख़त्म करने जैसा है।
