जुगनू

वह एक छोटा सा पल था जब वह उसे रोशनी के मुहाने पर छोड़ आया था और खुद अंधेरे की तरफ चल पड़ा था. जब वह उससे पहली बार उस भयानक अंधेरे में मिला था तो उसने कहा था - तुम जुगनू की तरह लगते हो, एक रोशनी सी निकलती है तुमसे. वह मुस्कुरा दिया था, शायद इसलिये कि यदि वहाँ रोशनी होती तो वह उसे एक मामूली सा कीड़ा समझती.

Father Mother Boy Kite IIT Kanpur

अंधेरा खूबसूरत दृश्य को भी भयानक बना देता है.. उसने वहाँ की खूबसूरती देखी थी सो उसे बस रोशनी के वहाँ तक पहुँच आने का इन्तज़ार था.. और वह रोशनी तक पहुँच जाना चाहती थी.

यह लघुकथा 2008 में लिखी गयी थी. उस दौर में दिमाग़ ज़्यादा विकसित नहीं हुआ था सो भावनाओं के सहारे अपने आस पास को समझने का सिलसिला चल रहा था।  लगभग दो दशक बाद उसी तरह के किरदारों को देखकर लगता है कि जीवन जीने का सलीका तब समझ आता है जब जीवन हाथ से निकल चुका होता है। आज भी कई बच्चे बस कहीं न कहीं पहुँच जाना चाहते हैं, बिना वर्तमान को महसूस किए।