हिन्दी वाली पोस्ट

 यह एक हिन्दी में लिखी पोस्ट है. जिसमें शृंगार शब्द ऋषि शब्द और श्रुति स्मृति शब्द की टेस्टिंग बेहर ज़रूरी है. 


तुम्हें पता है यह तड़प क्या होती है? पहाड़ी रास्तों से होते हुए वह काफी ऊपर आ चुकी थी और देर तक उस ऊँचाई से ज़मीन को एकटक निहारते हुए उसने अचानक से यह सवाल पूछा था. लेकिन वह दरारों से टपकती बूँदों को देखने में मशगूल था सो उसने अपने कंधे से उसे हिलाया और पूछा – तड़प समझते हो? वह समझ गया था कि कुछ अनोखा इधर से भी टपकने वाला है सो वह उसे देखते हुए बोला – नहीं, समझाओ… क्या होती है! वह एक बार फिर पहाड़ से बहुत नीचे ज़मीन पर रेंगती किसी चीज पर फोकस हो गयी – यहाँ से चीजें बहुत छोटी नज़र आती हैं न! यह भी तो धरती का ही एक हिस्सा है. वह मुस्कुराया और उसे टोकते हुए पूछा – तड़प क्या होती है? उसने अपनी पलकों को झपकाते हुए कहा - यह इस धरती पर जन्म लेते ही सौगात में मिल जाती है, पहली तड़प भूख की होती है. किसी बच्चे को भूख से बिलखते देखा है!! उस क्रंदन के पीछे छिपी होती है तड़प! किसी भूखे को तड़पते देखा है जब भोजन आस पास ही रखा हो लेकिन उसे मिल नहीं रहा हो. इस भूख की तड़प ने सदियों तक धरती के प्राणियों को दौड़ाया है. सब कुछ भूलकर और अपने प्राणों की परवाह किये बग़ैर पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ भागती रही हैं इधर से उधर. कभी घने जंगलों में तो कभी तपती हुई रेत में… यह तड़प हमें सौगात में मिली है और यह हमारे शरीर से जुड़ी है, जब तक यह शरीर रहेगा तब तक यह तड़प जारी रहेगी.
उसने गहरी साँस लेते हुए पूछा – तुम्हें भूख लगी है क्या? वह हँसने लगी, बोली – हाँ, कुछ है क्या खाने को? वह अपने बैग से कुछ चिप्स के पैकेट्स निकालने लगा तो वह उसे रोकते हुए बोली – नहीं रहने दो, अभी नहीं. उसने आश्चर्य से पूछा – अरे, भूख लगी है तो खा लो. उसने मुस्कुराते हुए कहा – नहीं, अभी तुम्हारा दिमाग खाने का मन है. तो तुम समझ गये तड़प क्या होती है? वह चिप्स का एक पैकेट फाड़ते हुए बोला – हाँ, भूख होती है. लो खाओ. उसने कुछ चिप्स निकाले और खाने लगी. खाते हुए एक बार फिर वह झिलमिलाते हुए क्षितिज में खो गयी. हमारी तड़प ने हमें कितना स्वार्थी बना दिया है न!! हमने भोजन जमा करना सीख लिया है, अपनी जरूरत से ज्यादा… नीचे रेंगती हुई दुनिया में कई अब भी भूखे ही होंगे न! वह हँसने लगा – अरे, यह सब मैनेजमेंट है. जमा नहीं करोगी तो खाओगी क्या? आदमी बेचारा सुबह-सुबह शिकार पर निकलेगा और मिलेगा कुछ नहीं. मछुआरे की कहानी नहीं सुनी क्या? बेचारा दिन भर जाल फेंकता था लेकिन एक भी मछली पकड़ में नहीं आती थी. मायूस लौटता तो पत्नी डाँट लगाती. पत्नी की डाँट न खाने के लिये मनुष्य जाति को ऐसा मैनेजमेंट करना पड़ा. यह कहते-सुनते ही दोनों एक साथ हँस पड़े थे.
कुछ देर तक हवाओं का शोर सुनने के बाद वह फिर से बोल पड़ी – शरीर से जुड़ी तड़प भूख है तो आत्मा से जुड़ी भी कोई तड़प होती होगी न!! उसने कुछ देर तक सोचा और पूछा – आत्मा होती है क्या? उसने कहा – तड़प किसको परेशान करती है बुद्धू? जिसको परेशान करती है, वही आत्मा है. वह हँसते हुए बोला – अगर ऐसा है तो फिर तुम तड़प और मैं आत्मा. वह जोर से हँसने लगती है और थोड़ी देर बाद उसकी बाँहों से लिपटकर हौले से कहती है – नहीं, तुम प्रेम और मैं आत्मा. आत्मा प्रेम की भूखी होती है. प्रेम न मिले तो उसकी आभा क्षीण होने लगती है. वह कुछ देर तक उसे मासूमियत से देखता रहा और फिर कहने लगा – सही कहती हो. दूसरी तड़प प्रेम की होती है. प्रेम न मिले तो देखो कैसे तड़पती है आत्मा. इन्सान भोजन से तृप्त होता है और आत्मा प्रेम से. आत्मा के सीनियर देवता लोग भी प्रेम और भक्ति से ही अपना पेट भरते हैं. चलो न्यूज़ चैनल वालों को आज की ताज़ी ख़बर परोस देते हैं वे सब भी ख़बर के भूखे होते हैं, बिना ख़बर के पूरी टीम तड़पती है. उन्हें सुकून प्राप्त होगा जब वे लाइव कहेंगे – गौर से सुनिये आज़ की ताज़ी ख़बर… भक्त की भक्ति का भूखा है भगवान…!! प्रेम के बिना नहीं भरता है उसका पेट… विस्तार से देखने के लिये इस चैनल को देखिये रात आठ बजे… क्योंकि उस वक़्त ज्यादा रिवेन्यू जेनरेट होता है.
तुम्हें हर वक़्त मज़ाक सूझता है, वह उसे दूसरी तरफ धकेलते हुए बोली. वह हँसते हुए कहा – अरे, मज़ाक की भूखी होती है हमारी खोपड़ी. शरीर और आत्मा के बाद इसी का नम्बर तो आता है. वह बोली – तुम्हें समझ तो आयेगी नहीं, खोपड़ी है लेकिन बुद्धि नहीं. उसने कहा – अच्छा, मतलब बुद्धि समझ की भूखी होती है!! वह हँसते हुए बोली – चलो, थोड़ी सी तो है ही. वह अचानक से गम्भीर होते हुए बोली – अच्छा, क्या होता अगर तुम मुझे नहीं मिलते? वह एक गीत के बोल दोहराने लगा - ‘जो तुम न मिलती, होता ही क्या ढूँढ लाने को… जो तुम न मिलती, होता ही क्या हार जाने को… मेरी अमानत हो तुम… तुम्हें कैसे बताऊँ?” उसने टोकते हुए कहा – बताऊँ नहीं भुलाऊँ… अरे बता ही तो रहा हूँ… भुलाने की तो कभी सोच भी नहीं सकता. वह उसकी आँखों को गौर से देखने लगती है. अरे, सच में… इस बार मज़ाक नहीं कर रहा.
वह थोड़ी और गम्भीर होकर कहती है – पता है, कभी-कभी ऐसा सोचती हूँ कि क्या होगा अगर इस तड़प को कोई छिपा ले जाये. जो वह चाहता है वह उसे न मिले. न भोजन और न प्रेम. कैसा होगा उसका जीवन! जीवन के किसी लम्हें में जब कभी उसका प्रेम उसके ठीक सामने हो और वह अपनी उस तड़प को ज़ाहिर न होने दे तो वे दोनों फिर से खो जायेंगे न! इस अंधेरी दुनिया में, अपनी-अपनी रोशनी के साथ… ऐसा सोच कर रोना आ जाता है. तुम्हारे बारे में सोचने लगती हूँ और तुम्हें दूर जाते हुए देखने लगती हूँ… वह सिसकने लगती है और उसकी आँखें आसुओं से भीग जाती हैं. उसके आँसुओं से भीगे हुए उसके हाथ उसे उसके उस प्रश्न का मौन उत्तर बता रहे थे – यह तड़प क्या होती है?
एक गीत कहीं से अपने आप उभर आया था – तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर, तूफ़ाँ ये प्यार का मन में छुपाकर. कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी, आँसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी… बोल क्या सूझी तुझको, काहे को प्रीत जगाई. काहे को दुनिया बनाई, तूने काहे को दुनिया बनाई…

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