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एहसासों का रास्ता

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एक अरसा पहले, लॉजिक से परे की दुनिया को एक्सप्लोर करने का मन हुआ था। क्या होगा अगर हम बिना कुछ सोचे समझे। केवल एहसासों के सहारे आगे बढ़ते चलें? जिधर जो अच्छा लगे उधर मुड़ जाना, ज़रा देखें हमें क्या मिलता है और हम कहाँ पहुँचते हैं।  उस दिन एक बच्चे की मुस्कान दिखी थी। हम उसकी तरफ़ मुड़े और उसके पैरेंट्स से बातें कीं, फिर वे लोग एक रास्ते पर आगे बढ़ चले। हम भी कुछ देर बाद उसी रास्ते पर चल दिए। एक मोड़ पर दूसरे कुछ बच्चे खेलते नज़र आये तो उस तरफ़ मुड़ गये। उससे आगे एक तालाब मिला, जिधर कभी नहीं गये थे। वहाँ की मछलियों को देखते हुए वहाँ के केयरटेकर से बातें की। फिर तालाब का एक चक्कर लगाने का मन हुआ और हमें उस तरफ़ झींगुरों की तेज़ आवाज़ें सुनाई देने लगीं। उस तरफ़ पूरा झींगुर की आवाज़ों से लिपटा एक अज़ीब सा सन्नाटा फैला था। ठीक पीछे से जाती सड़क के उस पार वह बच्चा फिर नज़र आया। इस बार उसकी मुस्कान रहस्यमयी लगी और वह अपने पैरेंट्स के साथ शहर के रास्ते पर आगे बढ़ गया। हम झींगुरों की आवाज़ों से घिरे हुए थे। वहाँ का सन्नाटा एकदम डरावना सा था। तभी एक कटी पतंग आसमान से गिर कर ठीक हमा...